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सख़्त नफ़रत हैं!

" मीरा! मीरा! प्लीज़ रुको। "

मीरा, जो सर झुकाए तेज़ क़दमों से चली जा रही थी, ये आवाज़ कानों में पड़ते ही उसके क़दम जैसे थम गए।

उसने निगाहें झुकाए रखीं, गालों पर हल्की-सी लाली उतर आई।

" मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था, आज तुम इतनी देर से क्यों आई हो? हम्म्। "

वो मीरा के क़रीब ज़रा-सा झुका, मगर मीरा झिझक कर हल्के से पीछे हट गई।

उस लड़के ने उसकी झिझक देखी तो उसके होंठों पर नर्म-सी मुस्कुराहट आ गई, वो इससे नावाक़िफ़ नहीं था।

वो एक क़दम पीछे हटते हुए बोला, " रिलैक्स! अब बताओ, इतनी देर क्यों हो गई? "

आख़िर मीरा ने आहिस्ता से सर उठाया, उसके चेहरे पर एक अजीब-सी कशिश थी, और आँखें मासूमियत से लबरेज़… हर बार की तरह वो उसे देखकर कुछ लम्हों के लिए ठहर-सा गया।

" व-वो… आज पापा बहुत ग़ुस्से में थे, इस लिए…! "

उसकी बात सुनकर वो लड़का एकदम ख़ामोश हो गया।

" अमन? ", मीरा ने नर्मी से पुकारा।

" चलो, क्लास के लिए देर हो रही है। "

" त-तुम नाराज़ हो? ", मीरा ने उसके साथ क़दम मिलाते हुए पूछा।

" मीरा! तुम इतनी प्यारी हो… मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकता… बस तुम अपने पापा से बहुत डरती हो। "

वो चुप हो गया।

मीरा रुक गई और उसे देखने लगी।

" मुझे डर लगता है… कहीं मैं तुम्हें खो न दूँ। ", उसकी आवाज़ जज़्बात से भीगी हुई थी।

अमन उसकी तरफ़ मुड़ा, आँखों में गहराई लिए बोला, " आई डोंट वांट टू लूज़ यू! "

मीरा ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, जैसे कोई सुन न ले।

फिर धीमे से बोली, " मैं भी… "

अमन बेइख़्तियार मुस्कुरा उठा।

" मैं कभी किसी को हमारे दरमियान नहीं आने दूँगा। "

" आई प्रॉमिस…", उसने दिल ही दिल में कहा।

दोनों साथ-साथ क्लास की तरफ़ बढ़ने लगे।

अमन की नज़र उसके हाथों पर पड़ी, जिनमें उसने अपना बैग मज़बूती से थाम रखा था।

अमन जानता था, वो घबराहट में ऐसा ही करती है।

उसका दिल चाहता था कि मीरा उसका हाथ थाम ले… मगर वो सिर्फ़ इंतज़ार ही कर सकता था।

" एक दिन ज़रूर… "

आर्यन पैलेस,

" अक्षय! "

एक औरत तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुईं, उनके चेहरे पर शदीद ग़ुस्सा था।

" जी मॉम! "

अक्षय ने अपनी भारी आवाज़ में घड़ी पहनते हुए जवाब दिया।

" बेटा! अब मुझसे ये सब और बर्दाश्त नहीं होता… वो पृथ्वी आर्यन! वो अपनी सारी जायदाद क़ानूनी तौर पर उस रक्षित के नाम करने वाला है। "

" अच्छा। ", उसका लहज़ा अब भी बेतहाशा ठंडा था।

" बस अच्छा? "

" मॉम, मुझे देर हो रही है… आपको कुछ और कहना है? "

आख़िर वो उनकी तरफ़ मुड़ा।

इतने में दिया आर्यन की आँखें छलक उठीं।

" मैंने इतने सालों तक ये ज़िल्लत सही है… सिर्फ़ तुम दोनों के लिए, ताकि तुम्हें तुम्हारा हक़ दिला सकूँ… एक रखैल की ज़िंदगी… "

" मॉम प्लीज़! "

अक्षय की मुट्ठियाँ भींच गईं… आख़िर कौन बेटा अपनी माँ के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ सुनना बर्दाश्त करेगा।

दिया आर्यन वहीं खड़ी रोती रहीं।

अक्षय आगे बढ़ा और उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

मगर उसके चेहरे के असरात ज़रा भी न बदले।

दिया आर्यन और ज़्यादा बिलख पड़ीं।

" मॉम! आपको यहाँ रहकर बेइज़्ज़ती सहने की ज़रूरत नहीं है… आपको जो चाहिए, वो सब मेरे पास है… वो सब, जो सिर्फ़ मेरा है। "

दिया आर्यन उससे अलग हो गईं।

" नहीं! हरगिज़ नहीं… मैं यहाँ से कहीं नहीं जाऊँगी… ये पूरा आर्यन अंपायर… ये सब तुम्हारा है… आख़िर तुम बड़े बेटे हो… मैं तुम्हें तुम्हारा हक़ दिलाकर रहूँगी। "

उन्होंने झुंझलाकर कहा और उससे दूर हो गईं।

अक्षय ने ग़ुस्से से आँखें बंद कर लीं।

वो एंटरटेनमेंट वर्ल्ड का बादशाह था, जो उसने अपनी मेहनत और क़ाबिलियत से हासिल किया था।

बिना अपने सरनेम का सहारा लिए।

अक्षय आर्यन… आर्यन ख़ानदान का सबसे बड़ा बेटा था, मगर उसे कभी वो रुतबा, वो ताक़त न मिल सकी… वजह थी उसकी माँ का मुक़ाम।

उसने दिन-रात मेहनत की थी… ये मुक़ाम हासिल करने के लिए… ताकि अपनी माँ को इज़्ज़त की ज़िंदगी दे सके… उन्हें वो ताक़त दे सके, जिसकी उन्हें चाह थी।

मगर उसकी माँ को इन सब से कोई वास्ता नहीं था… उनके सर पर तो बस आर्यन अंपायर हासिल करने का जुनून सवार था।

उनकी नज़र में अक्षय की क़ाबिलियत, उसका मुक़ाम… आर्यन अंपायर के सामने कुछ भी नहीं था।

" मुझे देर हो रही है। "

अक्षय ने हमेशा की तरह कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझा।

दिया आर्यन ने जल्दी से उसका हाथ पकड़ लिया, " मुझे तुमसे ज़रूरी बात करनी है। "

अक्षय रुक गया… मगर ख़ामोश रहा।

दिया आर्यन ने गहरी साँस ली, " मैंने आशुतोष नहर की छोटी बेटी मीरा से तुम्हारी शादी तय कर दी है। "

अक्षय ने ग़ुस्से से उनकी तरफ़ देखा।

" किससे पूछ कर? ", उसका लहज़ा सर्द था।

उसने झटके से उनका हाथ छुड़ा लिया।

उसका ज़ेहन जैसे सुन्न हो गया था।

शादी… एक ऐसा खोखला रिश्ता जिससे उसे सख़्त नफ़रत थी।

उसने अपने बाप की शादी देखी थी… जिनकी बीवी होते हुए भी उसकी माँ उनकी ज़िंदगी में थी।

उसके दादा… जिनकी बीवी के बावजूद न जाने कितने रिश्ते थे।

" क्या मतलब किससे पूछकर! मैं तुम्हारी माँ हूँ। "

दिया आर्यन झल्ला उठीं।

" मगर इसका ये मतलब नहीं कि आप मेरी ज़िंदगी का इतना बड़ा फ़ैसला मुझसे पूछे बग़ैर लेंगी… "

" मुझे शादी नहीं करनी… मुझे इस खोखले रिश्ते से नफ़रत है…"

" मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी की दख़लअंदाज़ी बर्दाश्त नहीं। "

वो इतने ज़ोर से बोला कि दिया आर्यन घबरा कर दो क़दम पीछे हट गईं।

अक्षय ने अपना ग़ुस्सा क़ाबू करने के लिए नज़र फेर ली।

दिया आर्यन ने फिर कोशिश की।

" तो किसने कहा उसे अपनी ज़िंदगी में शामिल करो! तुम बस उससे शादी कर लो…"

" आशुतोष नहर की कंपनी इंडिया में टॉप टेन में है… उनका कोई बेटा भी नहीं हैं… अगर तुम्हारी शादी मीरा से हो जाए तो तुम्हें कितना फ़ायदा होगा… वो ख़ुद कह चुके हैं कि वो तुम्हारे कारोबार में मदद करेंगे और…"

" इट्स इनफ…"

" मुझे किसी की मदद की ज़रूरत नहीं…और न ही मुझे शादी करनी है…"

" समझीं आप! ", वो ग़ुस्से से बोला।

वाज़ेह था… उनकी बातें उसे अंदर तक जला चुकी थीं।

" क्यों नहीं करनी शादी? यहाँ तुम्हारे बाप और दादा… जिनके एक से ज़्यादा अफ़ेयर्स रहे…"

" और तुम! इतनी मशहूर और ख़ूबसूरत मॉडल्स के बीच रहते हो… फिर भी तुम्हारा एक अफ़ेयर तक सामने नहीं आया… पता है लोग क्या-क्या बातें करते हैं तुम्हारे बारे में? "

" देखो बेटा… अगर तुम्हें कोई पसंद है तो… "

अक्षय बुरी तरह झल्ला उठा।

" न मुझे कोई पसंद है… न मुझे शादी करनी है… डू यू गेट दैट… "

वो और नहीं रुका… जाते हुए दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर गया… जिससे दिया आर्यन सहम गईं।

अक्षय तेज़ क़दमों से कॉरिडोर में बढ़ रहा था।

अचानक वो किसी से टकरा गया।

उसे कुछ नहीं हुआ… मगर सामने वाली शख़्सियत ज़ोर से ज़मीन पर गिर पड़ी।

अक्षय ने नीचे देखा… और कुछ पल वहीं खड़ा रह गया।

ज़मीन पर पड़ी वो औरत… जिसकी हालत इस वक़्त किसी फ़क़ीर से कम न थी… बिखरे बाल…बिखरी हालत।

वो उसके बाप की बीवी थी।

"मैत्री ओबेरॉय"

जिनकी दिमाग़ी हालत दुरुस्त नहीं थी।

देखा जाए तो अक्षय को उनसे नफ़रत होनी चाहिए थी… मगर वो उनके लिए कोई नफ़रत महसूस नहीं करता था।

वो झुक कर बैठा।

" आप ठीक हैं? "

" तुमने मुझे गिरा दिया। ", वो ग़ुस्से से बोलीं।

उनके कपड़े मैले थे… मगर अक्षय ने परवाह न की… और उन्हें संभाल कर खड़ा कर दिया।

बिना कुछ कहे वो वहाँ से चला गया।

मैत्री ओबेरॉय अपना सिर खुजाते हुए पीछे मुड़ीं… और उसे जाते हुए देखती रहीं।

शाम के वक़्त मीरा कॉलेज से लौटी… जैसे ही वो लिविंग हॉल में दाख़िल हुई, उसके क़दम रुक गए।

सामने सोफ़े पर उसके पापा आशुतोष नहर बैठे थे।

उसे देखते ही वो सख़्ती से बोले, " कहाँ गई थी? "

मीरा घबरा कर अपनी माँ की तरफ़ देखने लगी।

" कॉलेज गई थी। ", शिवानी जी ने फ़ौरन कहा।

" तुमसे पूछा मैंने? ", वो ग़ुस्से से चिल्लाए तो मीरा सहम गई।

शिवानी जी ख़ामोश हो गईं।

" तुम्हारा कॉलेज दो घंटे पहले ख़त्म हो गया था…"

" दो घंटे कहाँ थीं तुम? ", इस बार उनकी आवाज़ धीमी मगर सख़्त थी।

" व…वो… ए…एक दोस्त का बर्थडे था। ", वो ज़मीन की तरफ़ देखते हुए बोली।

" कितनी बार कहा है… ये आवारागर्दी मुझे पसंद नहीं… शरीफ़ घरों की लड़कियाँ ये सब नहीं करतीं…"

" कब समझ आएगी तुम्हें ये बात? "

मीरा की आँखें छलक उठीं।

" स…सॉरी। "

" अपने कमरे में जाओ। "

मीरा धीमे क़दमों से चल दी।

आशुतोष नहर अपनी बीवी की तरफ़ मुड़े।

" मैंने मीरा की शादी तय कर दी है। "

मीरा जो जा ही रही थी… ये सुनते ही उसके जिस्म में जैसे जान ही न रही… हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।

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